MOVIE REVIEW:- BHOPAL- A PRAYER FOR RAIN
Movie based on a real incident ….
‘भोपाल- अ प्रेयर फॉर रेन’ फिल्म भले ही सच्ची घटना पर आधारित हो परंतु हम इसे दोहरे नजरिये से देखे तो बेहतर .....
1 >>>> पहला पहलु भोपाल शहर की नजर से, जहाँ यह त्रासदी हुई.....
इस फिल्म में उन तमाम पहलुओं से बचने की कोशिश की गई है जिस पर से कोई विवाद खड़ा हो, मसलन न तो फिल्म में यूनियन कर्बोइड के सीईओ रहे वारेन एनडरसन् की गिरफ्तारी और फौरन हुई रिहाई दिखाई गई, न ही गैस त्रासदी के बाद की कोई घटना , तत्कालीन सरकार द्वारा यूनियन कॉर्बोइड के पक्ष में की गई कार्यवाही और न ही भोपाल गैस पीडितो का संघर्ष इत्यादी !!!!!! स्वाभाविक है कि फिल्म निर्देशक रवि कुमार किसी भी प्रकार के कानूनी झमेले में नहीं पड़ना चाहते होंगे, फिल्म में यूनियन कॉर्बोइड के खतरे को लेकर लगाया गया पूर्वानुमान को बेहतर तरीके से पेश किया गया है , फिल्म की कहानी का आधार बहुत हद तक भोपाल के पत्रकार राजकुमार केसवानी की उन खबरों को बनाया गया है जो की 3 दिसम्बर 84 के पहले उन्होंने समय समय पर भोपाल को यूनियन कॉर्बोइड के खतरे से आगाह करने के लिए लिखी , 96 मिनट तक एक सस्पेंस की तरह चली इस फिल्म में थोड़ी निराशा अंत में तब लगती है जब 2-3 दिसंबर की रात फैक्ट्री से हुए गैस रिसाव के बाद अस्पतालों में बढ़ता दबाब , और सुबह शहर की सड़को, रेल की पटरियों और तालाबो में फैले लाशो के ढेर पर जाकर फिल्म को रोक दिया जाता है.... फिल्म में त्रासदी के बाद हुए राजनैतिक और सामाजिक घटनाक्रम को न दिखाकर निर्देशक रवि कुमार एक ऐतिहासिक दुर्घटना पर बनी फिल्म के साथ पूरी तरह न्याय करने में सफल नही रहे।
2.>>>> फिल्म का दूसरा पहलु फिल्म का निर्देशन,कहानी और अभिनय है..
विश्व की सबसे बड़ी कृत्रिम मानवीय त्रासदी पर फिल्म बनाना ही एक चुनौती है...निर्देशक रवि कुमार की इस फिल्म में यूनियन कॉर्बोइड में पूर्व से चल रहे घटनाक्रम और पत्रकार मोटवांनी की रिसर्च फिल्म को बांधे रखती है , फिल्म का निर्देशन अच्छा है रवि कुमार गैस त्रासदी को लेकर जो दिखाना चाहते थे उसे तो उन्होंने बेहतर तरीके से दर्शाया है ... फिल्म के संवाद सधे हुए है ..फिल्म में गाने न रखकर बेवजह फिल्म की स्टोरी और समय को नहीं बढाया गया है ...रही बात अभिनय की तो यूनियन कॉर्बोइड फैक्ट्री में मैकेनिक बने दिलीप (राजपाल यादव) की संजीदगी भरी अदाकारी बता देती है की उन्हें यूँ ही नहीं एक सफल चरित्र अभिनेता कहा जाता है ....फिल्म में वारेन एंडरसन का रोल कर रहे मार्टिन सीन ने भी अपने डायलॉग और अभिनय के साथ पूरा तालमेल बैठाया है... पत्रकार मोटवानी (राज कुमार केसवानी-वास्तविक) के रोल में रहे प्रसिद्द हॉलीवुड अभिनेता काल पेन ने अपने अभिनय में उसी जिज्ञासा और उत्साह को दिखाया है जो कि किसी पत्रकार में कोई स्टोरी और इसकी रिसर्च को लेकर होनी चाहिए .काल पेन ने फिल्म में अपने अभिनय से एक पत्रकार को परदे पर जीवंत किया है, फैक्ट्री सुपरवाइजर रॉय के रोल में रहे जॉय सेनगुप्ता संवेदषील और डॉक्टर चंद्रा बने मशहूर चरित्र अभिनेता मनोज जोशी का अभिनय देखने लायक है इन दोनों ने अपने रोल के साथ पूरा न्याय किया है।
मध्यप्रदेश में टैक्स फ्री हो चुकी ‘भोपाल-अ प्रेयर फॉर रेन’ कुल मिलाकर एक अच्छी फिल्म है जो लोग भोपाल गैस त्रासदी और यूनियन कॉर्बोइड के कई पहलुओं से अब तक अनजान है वे जाकर यह फिल्म जरूर देखे उन्हें यह फिल्म पसंद आएगी।
एक बात और:- फिल्म रिव्यु देते वक्त यह कहना बिलकुल गलत होगा लेकिन मन में है तो कहे देते है कि हकीकत में बेसहारा और गरीब वास्तविक भोपाल गैस पीडितो के दर्द को न हमारी तत्कालीन सरकारो ने समझा और न ही इनके संघर्ष को फिल्म में दिखाया गया.. यूनियन कॉर्बोइड एक अमेरिकन कंपनी है और यह फिल्म अमेरिका में 7 नवंबर 14 को रिलीज की गई .... त्रासदी के बाद का दर्द फिल्म में बयां होता तो शायद अमेरिकन सरकार से गैस पीडि़तों के लिए कुछ और मदद की आस लगाई जा सकती थी ... बहरहाल जाइये और त्रासदी के उन पलो को परदे पर जीने की कोशिश कीजिये, जिन्हे भोपाल 30 बरस बाद आज भी जी रहा है।
सत्येन्द्र खरे की कलम से।
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