Tuesday, 2 December 2014

भोपाल गैस त्रासदी के 30 बरस..... हमारी सरकारों ने मानवीय संवेदनाओं के साथ जमकर खिलवाड़ किया

भोपाल गैस त्रासदी के 30 बरस.....
हमारी सरकारों ने मानवीय संवेदनाओं
के साथ जमकर खिलवाड़ किया

राजधानी भोपाल अपने आप में दो रूपों को संजोये हुए आगे बढ़ रही है, एक वो जो डीबी माॅल और अरेरा काॅलोनी की आधुनिकता, बड़े तालाब की रंगत, वीआईपी रोड, लिंकवे सड़कों पर दौड़ती गाडि़यों का शोर इत्यादि और दूसरा 30 साल पहले घटित हुए भोपाल गैस कांड के दुःख-दर्द झेल रही कैंची छोला, आरिफ नगर, कबाड़खाना, इतवारा, बुधवारा, मंगलावारा की तंग गलियां। विश्व की सबसे बड़ी गैस त्रासदी को आज 30 बरस हो गये और आज भी राजधानी भोपाल के एक पूरे हिस्से में यूनियन कार्बाइड का असर स्पष्ट देखा जा सकता है। यहां रह रहे लगभग हर परिवार ने उस समय कोई अपना खोया था या फिर बाद में गैस त्रासदी के हुए कुप्रभावों के असर को झेला।
यूनियन कार्बाइड कारखाने से रिसी मिथाईल आइसो साईनाईट गैस को हवा में घुलकर जो खेल करना था वह उसने बखूबी किया, लेकिन राज्य और देष की सरकारों ने गैस पीडि़तों की मानवीय संवेदनाओं के साथ भी कुछ कम खिलवाड़ नहीं किया। तत्कालीन राज्य व केन्द्र सरकारों ने वारेन एंडरसन को महज कुछ रूपयों का जुर्माना लगाकर छोड़ने का घाव पीडि़तों को दिया तो उस पर नमक छिड़कने का काम तमाम सरकारें समय दर समय करती रही।
भोपाल के वाशिन्दे जानते है, यहां के जनप्रतिनिधियों को भी पता है, सरकारी अधिकारियों ने भी समझा है कि मुआवजे की राषि के वितरण में तनिक भी न्याय नहीं हुआ। जिनकी पहुंच थी, उनके नाम आसानी से गैस त्रासदी प्रभावितों की सूची में दर्ज हुए और जो गरीब, असहाय थे, वे अपने हक की लड़ाई लड़ते-लड़ते या तो गुजर गये या फिर आज भी सरकार से कुछ राहत मिलने की उम्मीद में धरना प्रदर्षन या हड़ताल करते रहते है। हमारे जनप्रतिनिधियों, अपने लोगों, सरकारी अधिकारियों ने भोपाल गैस त्रासदी से बड़ी त्रासदी की रचना कर डाली, जो 30 बरस से अब तक अनवरत चली आ रही है और न जाने कब तक चलती रहेगी ?
पुराने भोपाल की गलियों में आप कभी किसी बुजुर्ग से चर्चा करें तो वे बातों-बातों में अपना दर्द बयां कर देते है, बताते है कि 2-3 दिसंबर की दरम्यिानी रात जो शादियां भोपाल में हुई, उसमें बाहरी लोगों ने शादी के कार्ड दिखा-दिखाकर अपने नाम गैस प्रभावितों की सूची में दर्ज कराये और इनमें से ज्यादातर वे लोग है जो शादियों में उपस्थित नहीं थे। इतना ही नहीं फर्जीवाड़े/दलाली की हद की दास्तान तो और भी लंबी है, सरकार द्वारा राहत के तौर पर जो अस्पताल खोले गये उनमें भी अपने बीच के लोगों ने दलाली का दंश गैस पीडि़तों को भरपूर दिया। कुल मिलाकर जो वास्तविक पीडि़त थे, बेसहारा थे उनकी सुध न तो तब ली गयी और न ही आगे ली जायेगी इस पर तमाम सवालिया निशान तत्कालीन सरकार ने उसी वक्त खड़े कर दिये थे।
सोचिये, महज कुछ वर्ग किलोमीटर में फैले शहर की त्रासदी को खत्म करनें में अगर भारत सरकार बौनी साबित हुई, तो सुनामी, भूकंप, साईक्लोन की चपेट में हमारे कई शहर आ जाये ंतो उनका क्या हश्र होगा? जापान में सुनामी के समय फुकुसिमा प्लांट से गैस रिसाव हुआ था, महज चार टापूओं पर बसे इस छोटे से देश न केवल गैस रिसाव से अपने नागरिकों की जान बचाई बल्कि भारत जैसे विशाल देश को एक फौरी राहत पहुंचाने का सबक भी सिखाया है।
यूनियन कार्बाइड का दंश झेल रहे भोपाल ने आर्थिक मदद के लिए कई बार गुहार लगाई, सरकारी कमेटियों, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालयों, सरकारी दलालों ने इन गुहारों को कितना सुना वो बताने की जरूरत नहीं है। परन्तु न्यायालय में पदस्थ न्यायाधीशो के उपर पड़ रहे अप्रत्यक्ष दबाव के चलते एंडरसन को छोड़ने, गैस पीडि़तों को कंपनी द्वारा मिलने वाली राहत राशी को कम करने और 84 की घटना के आरोपियों को सजा सुनानें में 2010 तक का समय लग जाना और इतने सब के बावजूद महज कुछ वर्षों की सजा सुनाना, हमारे लोगों की संवेदनाओं पर जोरदार तमाचा मारने जैसा है और हम आज भी अपनी सरकारों के सामने लाचार खड़े दिखाई देते है।
तत्कालीन सरकारों ने जो किया उस पर तमाम ऐसे सवालिया निशान आज भी जस के तस बने हुए है जो बताते है कि हमारे अपने जनप्रतिनिधियों ने मानवीय संवेदनाओं के साथ जमकर खिलवाड़ किया। गैस रिसाव की रात से लेकर मदद पहुंचाने में तीन दिन तक दूर रही सरकार जिसनें पीडि़तों की खोज खबर तक नहीं ली वो यूनियन कार्बाइड को बचाने की दिशा में सामने आ जाये तो इससे हमारे तत्कालीन मालिकों की गीदड़ भक्ति समझी जा सकती है। सरकार ने लोगों से यूनियन कार्बाइड पर की जाने वाली कार्यवाही का अधिकार छीनकर त्रासदी के दंष को बढ़ाने में मदद ही की, सरकार ने अप्रत्यक्ष रूप से औद्योगिक घरानों की भी मदद की जो गैस त्रासदी से सीधे तौर पर जुड़े थे, चाहे वो यूनियन कार्बाइड हो, सरकारी संस्थान या बैंक जिसके द्वारा राशि वितरित की जानी थी। कुल मिलाकर सरकार ने हमारी जनसंवेदनाओं का खुलकर मखौल उड़ाया। वो कहते है न कि ‘जब अपनों से ही सहारा न मिलें तो गैरों से कैसा गिला-शिकवा? इस कहावत को भोपाल के गैस पीडि़तों ने भलींभांति महसूस किया है।
आज भोपाल की सुर्खियां ये नहीं बन रही है कि गैस पीडि़तों को न्याय नहीं मिला, बल्कि सुर्खिया बटोर रही है एंडरसन की मौत की खबर और उसमें भी हमारे धैर्यवान भोपाली गैस पीडि़त आपस में मिठाई बांटकर आंसू पोंछ लेते है। काश इन भावनाओं को समझने वाली सरकारंे होती, काश वास्तविक गैस पीडि़तों तक न्याय पहुंचता? काश 30वीं वर्षगांठ में हम धरने, प्रदर्शन न करते बल्कि ये मानते कि हमनें त्रासदी की घटना को भुला दिया है और आज के आधुनिक भोपाल के साथ खड़े हो गये है।

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