Tuesday, 30 December 2014

अंतररास्ट्रीय महिला दिवस : एक कटाक्ष -9 march 2014

9march

कल समूचे विश्व में महिला दिवस मनाया गया , स्वाभाविक है की भारत भी इससे अछुता नही रहा , लेकिन महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को लेकर हम कितने संवेदनशील है वो महिला दिवस के दिन दिल्ली ने सारे देश को बता दिया , पिछले 48 घंटो  में10 रेप की घटनाये तो  देश की राजधानी में ही हो गई , अब आप ही खुद से पूछे की  देश किस खुशी में महिला दिवस मनाये ...????
कल सुबह से ही सारा माहौल महिलामय हो गया था , अखबार, विभिन्न समाचार चैनल , सोशल मीडिया और इससे परे आधुनिक समाज का नियमित हिस्सा बनता जा रहा फेसबुक सभी जगह महिला दिवस की शुभकामनाये अटी पड़ी थी... हर कोई इस मसले पर आगे आना चाहता है ... लेकिन साल में एक ही दिन ऐसा क्यूँ  ???? बाकि 364 दिन महिलाओं के प्रति हमारे व्यवहार में कुछ और ही रंग देखने क मिलता है,  हमारे सभ्य समाज में महिलाओं की स्थिति दयनीय है , महिलाओं के साथ घरेलु हिंसा, दहेज़ के लिए प्रतारणा , बच्चियों के लिए शिक्षा को लेकर  नकारात्मक रवैयाँ ये सब अतुल्य  भारत का ही हिस्सा है और अब तो प्रतिदिन बढ रही कन्या  भ्रूण हत्या से लेकर महिलाओं के रेप तक सब कुछ सामान्य घटनाये लगने लगी है , लेकिन ऐसा नही है की ये सब हम देखते नही है या समझते नही है ...कभी कभार हम जागरूक होकर इसका विरोध भी कर लेते है और कुछ समय पश्चात वहीढाक के तीन पात !!!!!!
मै इस लेख को आगे बढ़ाना चाह रहा हु लेकिन कुछ टीस कल से ही चुभ रही है वो ये की राष्ट्रपति भवन से दिल्ली गैंग पीड़ित लड़की को मरणोपरांत पुरुस्कार की घोषणा की गयी.. यही नही समूचे विश्व के रहनुमा अमेरिका ने भी उसकी बहादुरी सराही है ... मै इस बात से सहमत नही हु ... अरे किस बात की बहादुरी भाई ... अगर इन संवेधानिक ताकतों को कुछ देना था तो वो जल्द से जल्द न्याय ...जो अब तक तर्कसंगत बना हुआ है ... जब दिसम्बर जनवरी मे सारा देश लड़की के लिए दुआ और कठोर कानून की मांग कर इनके सामने गिडगिडा रहा था तब  तो रायसीना हिल के द्वार तक नही खुले...  लेकिन महिला दिवस के दिन ये राजनितिक  दल महिलाओं की सुरक्षा को लेकर ऐसा प्रचार कर रहे है जैसे महिलाओं की चिंता सबसे ज्यादा इन्हें ही हो ...ये पार्टियाँ ये नेता एक दिन मना कर , ढेरो वादे कर इतना तृप्त हो जाते है और साल भर उसका व्याज जनता से खाते रहते है...
माना की महिलाओं की स्थिति शहर मे बेहतर है , लेकिन गावों को लेकर आज भी सवालिया निशान हम सब पर है ... और इसके जिम्मेदार भी हम खुद है ...  गाँव मे महिला शिक्षा को लेकर हम कोई  परिवर्तन नही ला पा रहे है ... तमाम परियोजनाओं और लुभावने वादे भी इस दिशा मे फीके पड़ रहे है वजह है लोगो की मानसिकता .. और उसे बदलने के लिए पंचायत स्तर और जनपद स्तर पर हर ६ महीने मे गाँव के लोगो को महिलाओं की  महत्वता समझाना , उन्हें समाज मे बराबर की हिस्सेदारी समझना ..ग्रामीण स्तर पर उन्हें कई मसलो मे उचित पद दिलाना ...  इस दिशा मे सरकार की मदद कई एन जी ऒ कर सकते है ... लेकि ऐसा हो पाना सरकारी भ्रष्ट तंत्र के अन्दर दूर की कौड़ी साबित दिखाई पड़ता है.....
ग्रामीण परिवेश में एक समस्या और भी है जो सर्व विदित है और वो महिला की आबरू एवं उससे जुड़े परिवार की इज्ज़त ... मै बात कर रहा हु ग्रामीण क्षेत्र मे बढ रही महिलाओं  के साथ छेड़छाड़, रेप की घटनाये और उसके बाद इनकी हत्या से ... बात बिलकुल साफ़ है  शिक्षा की कमी , गरीबी , परिवार की   इज्ज़त का सवाल, पुलिस का भय और कई मामलो में सामंतवादी परिस्थिति के कारण ये मामले सामने नही आ पाते और धीरे धीरे यही स्थिति भयावह हो जाती है .. "घटना का विरोध न करना घटनाओ के बढने का कारण बनता  है"  .. यहाँ फिर से जागरूकता वाली बात आती है ... शिक्षा के लिए सरकार तमाम योजनाये चला रही है वहां इन्हें खुद से आगे  बढ़ना होगा ...  रही बात दवाब और पुलिस के भय की तो सरकार और नेताओ को चाहिए की हर गाँव में महिलाओं को इन मसलो के लिए एक हेल्पलाइन नंबर इन्हें देना चाहिए ..जिस तरह शहरो में देते है ... और इस पर निगरानी के लिए की ये सही काम कर रहे या नही जिला प्रशाशन और राज्य गृह मंत्रालय को सीधे दखल देना पड़ेगा .... मामला गंभीर है या गाँव में किसी सामंतवादी स्थिति से जुड़ा है तो परिवार की सुरक्षा और फ़ास्ट ट्रैक न्यायालय जरुरी करने होंगे ... और जब तक फैसला न हो जाये महिला और परिवार की सुरक्षा राज्य सरकार को करनी होगी ... तब जाकर स्थिति सामान्य होगी...  अगर सरकार और राजनीतिक दल  वाकई कुछ बदलाव चाहते है तो कठोर कदम आज से ही उठाने होंगे नही तो महिला दिवस तो है ही ये सब ढोंग करने के लिए ....
महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गाँव तक ही समस्यां नही है.. शहर में परिस्थिति और भी बदतर है यहाँ समस्याओं को ..आधुनिक काल की जरूरते कही जाने वाली टेक्नोलॉजी और भी बढ़ारही है .. टेक्नोलॉजी कहने को तो हमारी मदद करती है लेकिन कन्या भ्रूण हत्या के मामले इस टेक्नोलॉजी की कलई खोलते है.... छोटे से छोटे शहर से लेकर महानगर और राजधानी तक भ्रूण के लिंग का पता करना और कन्या होने पर उसकी हत्या करना एक व्यवसाय बन गया है ... क्या हम और हमारी सरकार इतनी नकारी हो गई है की इस  जघन्य अपराध के लिए चल रहे मेडिकल सेण्टर भी हम बंद नही करा सकते... हम सालो-साल लिंगानुपात की बात करते है उस पर चिंता व्यक्त करते है अभी २०११ की  जनगणना में हम ९४०/१००० पहुचे है अगर ऐसा ही चलता रहा तो आप खुद अंदाजा  लगाइए की क्या होगा ... हरियाणा और हमारे प्रदेश में भिंड की क्या स्थिति है ये किसी से छुपी  नही है ....यहाँ महिलाओं की कमी के चलते  कितने नौजवानों की शादियाँ नही हो प् रही और ये ही फिर रेप जैसे अपराधो की तरफ अग्रसर होते है.... सरकार और प्रशासन को बिना किसी राजनितिक दखलंदाजी के चलते ये सेण्टर बंद करा कर लोगो को जागरूक करने की जरुरत है ... रेप जैसी घटनाओं को रोकने के लिए स्कूल शिक्षा स्तर पर सेक्सुअल नॉलेज जैसे विषय पढ़ाने अनिवार्य करने चाहिए .. स्कूल शिक्षा स्तर पर ऐसे विषय पढाये जाने से न केवल आने वाली नस्लों का दिमाग खुलेगा बल्कि यही ज्ञान रेप जैसे मामलो में कमी भी लायेगा ...  और दिल्ली जैसे महानगरो में बढ रहे मामलो को लेकर ऐसी मुहीम पर हमे इसी वर्ष से काम करने की जरुरत है ...
अब बात करते है सरकारी योजनाओं की जो महिला की सुरक्षा , शिक्षा और सम्मान को लेकर बनायीं गयी है वो कितनी ज़मीन में है और कितनी पानी में ... सरकारे इस विषय पर कितनी संवेदनशील है वो का औसतन प्रदर्शन खुद अपनी दास्ताँ उजागर करता है...महिला सशक्तिकरण , जननी सुरक्षा , बेटी बचाओ , लाडली लक्ष्मी योजना एवं अन्य योजनाये सरकारों के वादों का बखान तो खूब करती  है लेकिन ज़मीन पर इन वादों को धता बताती है... बेटी बचाओ योजना मध्यप्रदेश की एक बेशकीमती योजना है जो प्रदेश में बच्चियों के मामा एवं मुखिया शिवराज ने लागु की थी लेकिन महिला दिवस के दिन जब बीते कुछ सालो में ४०००० लड़कियों  के गायब होने की घटना पर एन.एच.आर.सी. (National Human Rights Commission) विभाग  ने राज्य सरकार को फटकारा तो सच्चाई खुद ब खुद उजागर हो गई ... कितने शर्म की बात है कि जहाँ आज महिलाओं के सम्मान को लेकर विश्व में आवाज़े बुलंद हो रही है वही हमे ये आकडे जिल्लत भरी निगाहों से देख रहे है .... महिला सशक्तिकरण की सच्चाई ये है कि जब जब मामला महिला आरक्षण कि बात संसद में उठती है तो राजनितिक दल एक दुसरे के कुर्ते फाड़ने में लग जाते है ... अगर ये दल महिलाओं के सुरक्षा और सम्मान को लेकर  इतने ही गंभीर है तो एक मत क्यूँ  नही होते ..... अब जहाँ तक जननी सुरक्षा को लेकर बात है तो गाँव में दाई माँ और आशा कार्यकर्ताओं कि व्यवस्था हर गाँव में सरकार ने कि है और एक कॉल सेण्टर जिला में बनाया है जरुरत पड़ने पर एक विशेष नंबर पर कॉल कर मदद ली जा सकती है और   प्रसूति के समय इन्हें जिला अस्पताल तक पहुचाया जाये ... यह  एक अच्छी योजना है और इस पर सरकारे प्रसाशन अच्छा कार्य कर रही है .... इनके अलावा नारी सम्मान और सुरक्षा  को लेकर इस वर्ष के बजट में 1000 करोड़ रुपये " निर्भया फण्ड " को लेकर जारी किये गए है बस चिंता इस बात को लेकर है की इनका क्रियान्वयन सही तरह से हो जाये बस ?????  इस वर्ष बजट में महिला  बैंक की घोषणा भी की है जो नवम्बर से चालू होगा ... ये अच्छा कदम है लेकिन बेहतर होता की एक महिला न्यायलय की घोषणा भी होती जहाँ महिलाओं के शोषण को लेकर हुए मामले में जल्दी और उचित न्याय मिलता ...

महिला दिवस पर और भी कई बाते सरकार द्वारा सामने आई ... इनकी समाज में स्तिथि सुधारने के लिए भविष्य में कई और योजनाए आएगी कई और फण्ड भी फण्ड जारी होंगे ... लेकिन जहाँ विश्व में महिलाओं का वर्चस्व निरंतर बढता जा रहा है वही हमारे देश कि ये बढ़त आंशिक है .... और  मेरी कल्पना से परे है कि जहाँ इतनी सुविधाए सरकार देती है ,जहाँ देश जागरूक हो रहा है वही इन्हें लेकर  शोषण के मामले क्यूँ नही थम रहे .... ये सवाल है आप पर ,हम पर ...न्याय पालिका और  हमारी संसद पर .....????? 

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