Wednesday, 3 December 2014

MOVIE REVIEW :- BHOPAL- A PRAYER FOR RAIN

MOVIE REVIEW:- BHOPAL- A PRAYER FOR RAIN
Movie based on a real incident ….

‘भोपाल- अ प्रेयर फॉर रेन’ फिल्म भले ही सच्ची घटना पर आधारित हो परंतु हम इसे दोहरे नजरिये से देखे तो बेहतर .....
1 >>>> पहला पहलु भोपाल शहर की नजर से, जहाँ यह त्रासदी हुई..... 

   इस फिल्म में उन तमाम पहलुओं से बचने की कोशिश की गई है जिस पर से कोई विवाद खड़ा हो, मसलन न तो फिल्म में यूनियन कर्बोइड के सीईओ रहे वारेन एनडरसन् की गिरफ्तारी और फौरन हुई रिहाई दिखाई गई, न ही गैस त्रासदी के बाद की कोई घटना , तत्कालीन सरकार द्वारा यूनियन कॉर्बोइड के पक्ष में की गई कार्यवाही और न ही भोपाल गैस पीडितो का संघर्ष इत्यादी !!!!!! स्वाभाविक है कि फिल्म निर्देशक रवि कुमार किसी भी प्रकार के कानूनी झमेले में नहीं पड़ना चाहते होंगे, फिल्म में यूनियन कॉर्बोइड के खतरे को लेकर लगाया गया पूर्वानुमान को बेहतर तरीके से पेश किया गया है , फिल्म की कहानी का आधार बहुत हद तक भोपाल के पत्रकार राजकुमार केसवानी की उन खबरों को बनाया गया है जो की 3 दिसम्बर 84 के पहले उन्होंने समय समय पर भोपाल को यूनियन कॉर्बोइड के खतरे से आगाह करने के लिए लिखी , 96 मिनट तक एक सस्पेंस की तरह चली इस फिल्म में थोड़ी निराशा अंत में तब लगती है जब 2-3 दिसंबर की रात फैक्ट्री से हुए गैस रिसाव के बाद अस्पतालों में बढ़ता दबाब , और सुबह शहर की सड़को, रेल की पटरियों और तालाबो में फैले लाशो के ढेर पर जाकर फिल्म को रोक दिया जाता है.... फिल्म में त्रासदी के बाद हुए राजनैतिक और सामाजिक घटनाक्रम को न दिखाकर निर्देशक रवि कुमार एक ऐतिहासिक दुर्घटना पर बनी फिल्म के साथ पूरी तरह न्याय करने में सफल नही रहे।

2.>>>> फिल्म का दूसरा पहलु फिल्म का निर्देशन,कहानी और अभिनय है..
 
विश्व की सबसे बड़ी कृत्रिम मानवीय त्रासदी पर फिल्म बनाना ही एक चुनौती है...निर्देशक रवि कुमार की इस फिल्म में यूनियन कॉर्बोइड में पूर्व से चल रहे घटनाक्रम और पत्रकार मोटवांनी की रिसर्च फिल्म को बांधे रखती है , फिल्म का निर्देशन अच्छा है रवि कुमार गैस त्रासदी को लेकर जो दिखाना चाहते थे उसे तो उन्होंने बेहतर तरीके से दर्शाया है ... फिल्म के संवाद सधे हुए है ..फिल्म में गाने न रखकर बेवजह फिल्म की स्टोरी और समय को नहीं बढाया गया है ...रही बात अभिनय की तो यूनियन कॉर्बोइड फैक्ट्री में मैकेनिक बने दिलीप (राजपाल यादव) की संजीदगी भरी अदाकारी बता देती है की उन्हें यूँ ही नहीं एक सफल चरित्र अभिनेता कहा जाता है ....फिल्म में वारेन एंडरसन का रोल कर रहे मार्टिन सीन ने भी अपने डायलॉग और अभिनय के साथ पूरा तालमेल बैठाया है... पत्रकार मोटवानी (राज कुमार केसवानी-वास्तविक) के रोल में रहे प्रसिद्द हॉलीवुड अभिनेता काल पेन ने अपने अभिनय में उसी जिज्ञासा और उत्साह को दिखाया है जो कि किसी पत्रकार में कोई स्टोरी और इसकी रिसर्च को लेकर होनी चाहिए .काल पेन ने फिल्म में अपने अभिनय से एक पत्रकार को परदे पर जीवंत किया है, फैक्ट्री सुपरवाइजर रॉय के रोल में रहे जॉय सेनगुप्ता संवेदषील और डॉक्टर चंद्रा बने मशहूर चरित्र अभिनेता मनोज जोशी का अभिनय देखने लायक है इन दोनों ने अपने रोल के साथ पूरा न्याय किया है।

मध्यप्रदेश में टैक्स फ्री हो चुकी ‘भोपाल-अ प्रेयर फॉर रेन’ कुल मिलाकर एक अच्छी फिल्म है जो लोग भोपाल गैस त्रासदी और यूनियन कॉर्बोइड के कई पहलुओं से अब तक अनजान है वे जाकर यह फिल्म जरूर देखे उन्हें यह फिल्म पसंद आएगी।

एक बात और:- फिल्म रिव्यु देते वक्त यह कहना बिलकुल गलत होगा लेकिन मन में है तो कहे देते है कि हकीकत में बेसहारा और गरीब वास्तविक भोपाल गैस पीडितो के दर्द को न हमारी तत्कालीन सरकारो ने समझा और न ही इनके संघर्ष को फिल्म में दिखाया गया.. यूनियन कॉर्बोइड एक अमेरिकन कंपनी है और यह फिल्म अमेरिका में 7 नवंबर 14 को रिलीज की गई .... त्रासदी के बाद का दर्द फिल्म में बयां होता तो शायद अमेरिकन सरकार से गैस पीडि़तों के लिए कुछ और मदद की आस लगाई जा सकती थी ... बहरहाल जाइये और त्रासदी के उन पलो को परदे पर जीने की कोशिश कीजिये, जिन्हे भोपाल 30 बरस बाद आज भी जी रहा है।

सत्येन्द्र खरे की कलम से।

Tuesday, 2 December 2014

भोपाल गैस त्रासदी के 30 बरस..... हमारी सरकारों ने मानवीय संवेदनाओं के साथ जमकर खिलवाड़ किया

भोपाल गैस त्रासदी के 30 बरस.....
हमारी सरकारों ने मानवीय संवेदनाओं
के साथ जमकर खिलवाड़ किया

राजधानी भोपाल अपने आप में दो रूपों को संजोये हुए आगे बढ़ रही है, एक वो जो डीबी माॅल और अरेरा काॅलोनी की आधुनिकता, बड़े तालाब की रंगत, वीआईपी रोड, लिंकवे सड़कों पर दौड़ती गाडि़यों का शोर इत्यादि और दूसरा 30 साल पहले घटित हुए भोपाल गैस कांड के दुःख-दर्द झेल रही कैंची छोला, आरिफ नगर, कबाड़खाना, इतवारा, बुधवारा, मंगलावारा की तंग गलियां। विश्व की सबसे बड़ी गैस त्रासदी को आज 30 बरस हो गये और आज भी राजधानी भोपाल के एक पूरे हिस्से में यूनियन कार्बाइड का असर स्पष्ट देखा जा सकता है। यहां रह रहे लगभग हर परिवार ने उस समय कोई अपना खोया था या फिर बाद में गैस त्रासदी के हुए कुप्रभावों के असर को झेला।
यूनियन कार्बाइड कारखाने से रिसी मिथाईल आइसो साईनाईट गैस को हवा में घुलकर जो खेल करना था वह उसने बखूबी किया, लेकिन राज्य और देष की सरकारों ने गैस पीडि़तों की मानवीय संवेदनाओं के साथ भी कुछ कम खिलवाड़ नहीं किया। तत्कालीन राज्य व केन्द्र सरकारों ने वारेन एंडरसन को महज कुछ रूपयों का जुर्माना लगाकर छोड़ने का घाव पीडि़तों को दिया तो उस पर नमक छिड़कने का काम तमाम सरकारें समय दर समय करती रही।
भोपाल के वाशिन्दे जानते है, यहां के जनप्रतिनिधियों को भी पता है, सरकारी अधिकारियों ने भी समझा है कि मुआवजे की राषि के वितरण में तनिक भी न्याय नहीं हुआ। जिनकी पहुंच थी, उनके नाम आसानी से गैस त्रासदी प्रभावितों की सूची में दर्ज हुए और जो गरीब, असहाय थे, वे अपने हक की लड़ाई लड़ते-लड़ते या तो गुजर गये या फिर आज भी सरकार से कुछ राहत मिलने की उम्मीद में धरना प्रदर्षन या हड़ताल करते रहते है। हमारे जनप्रतिनिधियों, अपने लोगों, सरकारी अधिकारियों ने भोपाल गैस त्रासदी से बड़ी त्रासदी की रचना कर डाली, जो 30 बरस से अब तक अनवरत चली आ रही है और न जाने कब तक चलती रहेगी ?
पुराने भोपाल की गलियों में आप कभी किसी बुजुर्ग से चर्चा करें तो वे बातों-बातों में अपना दर्द बयां कर देते है, बताते है कि 2-3 दिसंबर की दरम्यिानी रात जो शादियां भोपाल में हुई, उसमें बाहरी लोगों ने शादी के कार्ड दिखा-दिखाकर अपने नाम गैस प्रभावितों की सूची में दर्ज कराये और इनमें से ज्यादातर वे लोग है जो शादियों में उपस्थित नहीं थे। इतना ही नहीं फर्जीवाड़े/दलाली की हद की दास्तान तो और भी लंबी है, सरकार द्वारा राहत के तौर पर जो अस्पताल खोले गये उनमें भी अपने बीच के लोगों ने दलाली का दंश गैस पीडि़तों को भरपूर दिया। कुल मिलाकर जो वास्तविक पीडि़त थे, बेसहारा थे उनकी सुध न तो तब ली गयी और न ही आगे ली जायेगी इस पर तमाम सवालिया निशान तत्कालीन सरकार ने उसी वक्त खड़े कर दिये थे।
सोचिये, महज कुछ वर्ग किलोमीटर में फैले शहर की त्रासदी को खत्म करनें में अगर भारत सरकार बौनी साबित हुई, तो सुनामी, भूकंप, साईक्लोन की चपेट में हमारे कई शहर आ जाये ंतो उनका क्या हश्र होगा? जापान में सुनामी के समय फुकुसिमा प्लांट से गैस रिसाव हुआ था, महज चार टापूओं पर बसे इस छोटे से देश न केवल गैस रिसाव से अपने नागरिकों की जान बचाई बल्कि भारत जैसे विशाल देश को एक फौरी राहत पहुंचाने का सबक भी सिखाया है।
यूनियन कार्बाइड का दंश झेल रहे भोपाल ने आर्थिक मदद के लिए कई बार गुहार लगाई, सरकारी कमेटियों, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालयों, सरकारी दलालों ने इन गुहारों को कितना सुना वो बताने की जरूरत नहीं है। परन्तु न्यायालय में पदस्थ न्यायाधीशो के उपर पड़ रहे अप्रत्यक्ष दबाव के चलते एंडरसन को छोड़ने, गैस पीडि़तों को कंपनी द्वारा मिलने वाली राहत राशी को कम करने और 84 की घटना के आरोपियों को सजा सुनानें में 2010 तक का समय लग जाना और इतने सब के बावजूद महज कुछ वर्षों की सजा सुनाना, हमारे लोगों की संवेदनाओं पर जोरदार तमाचा मारने जैसा है और हम आज भी अपनी सरकारों के सामने लाचार खड़े दिखाई देते है।
तत्कालीन सरकारों ने जो किया उस पर तमाम ऐसे सवालिया निशान आज भी जस के तस बने हुए है जो बताते है कि हमारे अपने जनप्रतिनिधियों ने मानवीय संवेदनाओं के साथ जमकर खिलवाड़ किया। गैस रिसाव की रात से लेकर मदद पहुंचाने में तीन दिन तक दूर रही सरकार जिसनें पीडि़तों की खोज खबर तक नहीं ली वो यूनियन कार्बाइड को बचाने की दिशा में सामने आ जाये तो इससे हमारे तत्कालीन मालिकों की गीदड़ भक्ति समझी जा सकती है। सरकार ने लोगों से यूनियन कार्बाइड पर की जाने वाली कार्यवाही का अधिकार छीनकर त्रासदी के दंष को बढ़ाने में मदद ही की, सरकार ने अप्रत्यक्ष रूप से औद्योगिक घरानों की भी मदद की जो गैस त्रासदी से सीधे तौर पर जुड़े थे, चाहे वो यूनियन कार्बाइड हो, सरकारी संस्थान या बैंक जिसके द्वारा राशि वितरित की जानी थी। कुल मिलाकर सरकार ने हमारी जनसंवेदनाओं का खुलकर मखौल उड़ाया। वो कहते है न कि ‘जब अपनों से ही सहारा न मिलें तो गैरों से कैसा गिला-शिकवा? इस कहावत को भोपाल के गैस पीडि़तों ने भलींभांति महसूस किया है।
आज भोपाल की सुर्खियां ये नहीं बन रही है कि गैस पीडि़तों को न्याय नहीं मिला, बल्कि सुर्खिया बटोर रही है एंडरसन की मौत की खबर और उसमें भी हमारे धैर्यवान भोपाली गैस पीडि़त आपस में मिठाई बांटकर आंसू पोंछ लेते है। काश इन भावनाओं को समझने वाली सरकारंे होती, काश वास्तविक गैस पीडि़तों तक न्याय पहुंचता? काश 30वीं वर्षगांठ में हम धरने, प्रदर्शन न करते बल्कि ये मानते कि हमनें त्रासदी की घटना को भुला दिया है और आज के आधुनिक भोपाल के साथ खड़े हो गये है।

Tuesday, 9 September 2014

बाढ़ की विभीषिका में फसे दो देश

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