Friday, 29 July 2016

मोदी जी , काश्मीर मे चल क्या रहा है ?

मोदी जी , काश्मीर मे चल क्या रहा है ?
-सत्येंद्र खरे
            31 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मन की बात कार्यक्रम से एक बार फिर देश को संबोधित करने जा रहे है, हर बार की तरह इस बार भी प्रधानमंत्री लोगो को जागरूक करने के संदेश देश की जनता को देंगे लेकिन इस बार मोदी जी के मन मे काश्मीर को लेकर क्या बात है वो महत्वपूर्ण होगी, हो सकता है प्रधानमंत्री इस संवेदनशील मुद्दे को मन की बात मे रखे भी न, परंतु राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ये विषय फिलहाल अपनी महत्ता बनाए हुए है, आतंकवादी बुरहान वानी की मौत के बाद पूरे जुलाई के महीने कश्मीर आतंक के साये मे रहा, लगातार विरोध, पेलेट्स गन, पाकिस्तान की गीदड़ फफ़्तिया घाटी मे गूँजती रही, भारत ने भी इस विरोध को दबाने मे अपनी ताकत झोंक दी, कश्मीर मे कई तरह की पाबंदिया लगाने के साथ भारत इस विरोध को दबाने मे कामयाब हुआ, परंतु सवाल ये उठता है कि इस तरह से कब तक चलता रहेगा ? आखिर कब तक काश्मीरी युवा पड़ोसी मुल्क और चरमपंथियों के बहकावे मे आकार अपने ही देश को नुकसान पहुचाते रहेंगे? इन तमाम विरोधो के बावजूद भी भारत अपनी विदेश नीति के जरिये पाकिस्तान की हर चाल को कमजोर करने मे कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहा है, पूरे महीने पाकिस्तान से चली टकराव भरी गतिविधियों के बावजूद देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह 3 अगस्त को सार्क की बैठक मे हिस्सा लेने पाकिस्तान जा रहे है, बैठक से क्या निष्कर्ष निकलेगा ये तो आने वाला समय ही बताएगा बहरहाल मन की बात मे मोदी कश्मीर राग छेड़ते है या नहीं वो तो 31 जुलाई को पता चल ही जाएगा पर उसके पहले कश्मीर मे अब तक क्या हुआ उसे सिलसिले वार जान लेते है l
             भारत पाक बटवारे के समय से चल रही कश्मीर कि लड़ाई अब तक निर्णायक दौर पर नहीं पहुच पायी है और शायद आसानी से पहुचे भी नहीं क्यूंकि पाकिस्तान ने समय समय पर इस पूरे क्षेत्र को अपनी नापाक चालो से नुकसान पहुचाया है तो वही अब तक की केंद्र सरकारे भी इस क्षेत्र की जनता का पूरा विश्वास जीत पाने मे नाकामयाब साबित हुई हैघाटी भी समय समय पर तमाम घटनाक्रमो मे दहलती रही है फिर चाहे वो 1953 मे शेख अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री पद से हटाना, 1964 के काश्मीर दंगे, 84 मे फारुख अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री पद से हटाया जाना, 87 मे कश्मीर चुनाव के समय धांधलियाँ या फिर 1989 से चरमपंथियों और आतंकवादियों द्वारा शुरू की गई भारत के खिलाफ जंग जो आज तक जारी है,इन सारी घटनाओं मे अलगाववादियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही जो कश्मीरियों को अपने हित के लिए बरगलाते रहे, इन सारे घटनाक्रमो मे परोक्ष रूप से पाकिस्तान के हाथ होने के सबूत मिलते रहे है l 1999 मे हुए कारगिल युद्ध मे तो पाकिस्तान को मुंह की खानी पडी थी और संजोग देखिये कि तब भी पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ, भारत मे एनडीए की केंद्र सरकार और जुलाई का महीना था और आज भी वही स्थिति सामने है आज जब केंद्र सरकार कश्मीर मे विरोध को दबाने के लिए कड़े निर्णय ले रही है तो न तो अलगवादियों को ये बात पच रही है, न पाकिस्तान को और न ही विरोधी ताकतों को l पाकिस्तान समर्थित आतंकियों की मौत के बाद जुलाई भर कश्मीर मे चली टकराव की स्थिति और भारतीय सेना द्वारा आतंकियों पर की गई खुली कार्यवाही को लेकर पाकिस्तान को ही अब चिंतन बैठक करने की आवश्यकता आन पड़ी है, 2 अगस्त को पाकिस्तान संसद के सयुंक्त सदनो को बुलाकर कश्मीर पर चिंतन बैठक करने वाला है l
            पाकिस्तान की चिंता का कारण जो आज है उसकी शुरुआत तो भारत मे 2014 के चुनाव के पहले ही हो गई थी, साल 2014 के केन्द्रीय चुनाव के पहले गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया, कांग्रेस पहले ही भ्रष्टाचार के कीर्तिमान स्थापित कर जनता का विश्वास खो चुकी थी और ऐसे मे नरेंद्र मोदी चुनाव प्रचार से अच्छे दिन आने वाले है का नारा बुलंद कर रहे थे और पड़ोसी मुल्क को उसी की भाषा मे जवाब देने की बाते चैनल दर चैनल कर रहे थे, देश की जनता मे उम्मीद जग रही थी की शायद ये प्रधानमंत्री कश्मीर की समस्या का हल निकालने मे कामयाब होंगे, प्रधानमंत्री बनने के साथ ही नरेंद्र मोदी ने शपथ ग्रहण के समय पाकिस्तान समेत पड़ोसी मुल्को को अपने शपथ ग्रहण मे बुलाकर विदेश नीति मजबूत करने और अपनी कूटनीतिक चालो को चलना शुरू कर दिया, मोदी ने पिछले दो सालो मे ताबड़तोड़ विदेशी दौरे कर भारत की खोयी साख को भी मजबूत किया है और पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को बढ़ावा देने की नीतियों को दुनिया के सामने रखा, आज जब काश्मीर मे भारत सरकार अपनी मजबूत विदेश  नीति के बल पर खुलकर आतंक का दमन करने सामने आई है तो यहाँ ये कहना गलत नहीं होगा जब एक समय प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने भी मजबूत विदेश नीति बनाकर पाकिस्तान को तोड़कर बांग्लादेश बनाया था इन्दिरा गांधी ने भी इसी तरह अपना पक्ष रखने और पाकिस्तान को तोड़ने को लेकर अमेरिका सोवियत संघ समेत तमाम देशो का दौरा किया और विदेशी कूटनीति को मजबूत कर मुक्तिवाहिनी भारतीय सेना को पूर्वी पाकिस्तान के अंदर भेजा और भारत ने अपने दम पर ही पाकिस्तान के टुकड़े कर ये घोषित कर के दिखा दिया कि बांगलादेश दुनिया का नया राष्ट्र होगा l
            आज जब काश्मीर समस्या को सुलझाने मे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगे हुए है तो उनके विदेशी दौरो को हम पाकिस्तान और कश्मीर विषय से जोड़कर देख सकते है क्यूंकि पिछले साल हुए कश्मीर चुनाव के बाद भाजपा ने धुर विरोधी पीडीपी को समर्थन देकर ये तो साबित कर दिया है कि भाजपा काश्मीर मे मिली जीत को हर हाल मे भुनाना चाहती है,कश्मीरी पंडितो की घर वापीसी को लेकर भी इस दौर मे सकारात्मक प्रभाव देखने को मिले है, 2014 से लेकर अब तक पठानकोट स्थित सेना के केंट को छोड़कर न तो काश्मीर मे कोई बड़ी आतंकी वारदात हुई और न ही समूचे देश मे और ऐसे मे अगर काश्मीर समस्या को सुलझाना है तो काश्मीर की समस्या का हल भी काश्मीर मे सरकार के रहते होते जाते दिखाई देता है न की बाहर रहने से आज जब कश्मीर मे उबाल है तो पीडीपी भी ऐसे किसी भी बयान को देने मे और कोई कदम उठाने से पहले दस बार सोच रही है कि कहीं कोई गलत कदम से गठबंधन को फर्क तो नहीं पड़ेगा, मतलब मोदी की ऐसी चाल की चित भी मेरी और पट भी मेरी l
            प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी नीतियों के बल पर कश्मीर को लेकर पाकिस्तान के साथ साथ पीडीपी,अलगाववादियों, विरोधी ताकतों को घेर रखा है क्यूंकि मोदी जिन वादो को लेकर सत्ता मे आए थे वो आज 26 महीने बाद भी पूरे होते दिखाई नहीं देते है,  सरकार के पास 34 महीने अभी और बाकी है ऐसे मे आकलन किया जाए तो कश्मीर और विदेश नीति ही है जिसमे भारत को फिलहाल ठीक ठीक सफलता मिली है, भारतीय सेना के द्वारा म्यामार के अंदर किया गया ऑपरेशन हो, सीरिया से भारतीयो को निकालने का ऑपरेशन या हाल ही मे दक्षिण सूडान से भारतीयो को निकालने का ऑपरेशन जिसके कसीदे तो पढे जा सकते है परंतु अब तक न तो विदेश से काला धन लाने मे मोदी सरकार कोई खास सफलता हाथ लगी है  और न ही महंगाई को कम करने मे l अच्छे दिनो के सपने तो फिलहाल सपने मे भी नहीं आ रहे है तो ऐसे मे भाजपा आने वाले केन्द्रीय चुनाव मे जिन मुद्दो को लेकर जाएगी उसमे काश्मीर की समस्या को हल करने की दिशा मे सकारात्मक कदम उठाना ये एक मुद्दा हो सकता है और इस मुद्दे को भुनाने के लिए सरकार हर संभव प्रयास कर कश्मीर समस्या को सुलझाने की दिशा मे एक नया कदम उठाएगी   
            आज जब पूरे जुलाई के महीने देश मे जनता के मन मे सवाल उठते रहे कि काश्मीर मे चल क्या रहा है, ऐसे मे मोदी जी 31 जुलाई को मन की बात कार्यक्रम मे कश्मीर को लेकर क्या बताएँगे ? पिछले एक महीने मे काश्मीर से तमाम तरह की बाते जो सोशल और मेनस्ट्रीम मीडिया के जरिये सामने आई है मसलन भारतीय सेना आतंकियो को ढूंढ ढूंढ का मार रही है, भारतीय सेना काश्मीर के निर्दोष परिवारों को अपना निशाना बना रही है, तो एक जिज्ञासा बनती है कि आखिर इन बातों की सच्चाई क्या है ? पाक और चीन मिलकर पाक अधिकृत काश्मीर मे सयुंक्त मार्च पास्ट कर रहे है,भारत सरकार द्वारा पूरे घाटी क्षेत्र मे कर्फ़्यू लगाया जाता है मीडिया पर पाबंदी लगाई जा रही है, इंटरनेट काटा जा रहा है तो सवाल ये बनता है कि घाटी मे 1999 के बाद क्या एक बार फिर जंग का माहौल है?  इसी दौर मे जब काश्मीर मे माहौल संवेदनशील बना हुआ है तब चीन उत्तराखंड के चमौली क्षेत्र मे 200 मीटर अंदर तक आकार चहल कदमी कर रहा है, तो क्या पाक और चीन मिलकर भारत को घेरने मे लगे है तो इन सब के बीच सीधा सवाल ये निकल कर आता है कि मोदी जी बताइये की तमाम कूटनीतिक बिसातों के बावजूद आखिर काश्मीर मे क्या चल रहा है ?  
            -लेखक स्वतंत्र पत्रकार और स्तम्भ लेखक है

Sunday, 29 November 2015

(मुख्यमंत्री शिवराज के 10 साल –भाग 2) शिवराज सिंह चौहान :- व्यक्तित्व, राजनीति और प्रसाशनिक नेत्रत्व

(मुख्यमंत्री शिवराज के 10 साल –भाग 2)
शिवराज सिंह चौहान :- व्यक्तित्व, राजनीति और प्रसाशनिक नेत्रत्व
            मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी संवेदनशीलता के बल और विकास के कर्तव्य पथ  पर चलकर 10 वर्ष पूरे कर लिए है, और इस कालखंड के दौरान देखने लायक जो मुख्य रही वो यह कि मध्यप्रदेश के इतिहास मे किसानो के सर्वाधिक कल्याण के कार्यक्रम शिवराज सरकार ने ही चलाये, खेती को लाभ का धंधा बनाने के इस जुनून ने शिवराज को किसानो का मसीहा तक बना दिया, शिवराज स्वयं एक किसान पुत्र है इसलिए वे भली भांति जानते थे कि किसानो कि समस्याए क्या है ? और उन समस्याओं के हल निकाल दिये जाए तो प्रदेश के अन्नदाता क्रषी विकास मे प्रदेश को नई उचाइयाँ प्रदान कर सकते है, शिवराज ने पिछले 10 वर्षो मे इस ओर बहतरीन काम करके भी दिखाया जिसका परिणाम हमे प्रदेश कि क्रषी विकास दर 24.99 प्रतिशत तक पेहुचकर न केवल देश मे अपितु विश्व मे सर्वाधिक दर्ज कि गई, शिवराज के क्रषी विकास की दिशा मे किए गए अनेकों अनेक योजनाओं का सार्थक परिणाम यह रहा कि किसानो कि आर्थिक स्थिति पहले कि अपेक्षा मजबूत हुई और साथ ही प्रदेश को भी पिछले तीन वर्षो से लगातार केंद्र सरकार के द्वारा “क्रषी कर्मण पुरुष्कार” से सुशोभित किया जा रहा है l शिवराज सिंह किसानो और मजदूरो से संवाद करते हुए अक्सर एक जुमले का जिक्र करते है कि “राम कि चिराइया राम के खेत, खाओ री चिरइयों भर भर पेट” , और उन्होने इस जुमले को जमीन पर सार्थक करने का काम भी किया है
            शिवराज ने हमेशा मजदूर और किसानो के हित के लिए अपनी राजनीति को सर्वोपरी रखा, बचपन मे ही किसान और मजदूरो के हितो कि रक्षा करने के गुण बाल शिवराज मे दिखाई देने लग गए थे, ऐसे ही एक घटना का जिक्र आज भी स्वयं शिवराज सिंह चौहान बड़े रोमांचकारी, हंसी,ठिठोली के साथ अनौपचारिक चर्चाओं मे करते दिखाई देते है, वो ठेठ भाषा बोली के साथ बताते है कि जब वे 13  साल कि उम्र से रहे तब गाव मे मजदूरन को खेत मे काम करवे के लाने ढाई पाई रोजाना मिलत रही और मजदूरन को इतने कम पईसा मे गुजारा नहीं हो पात रहो तब मैंने खुदई आगे बढ़ के मज़दूरन को इकट्ठों करो और कई कि ढाई कि जगह पाँच पाई मांगो और नारा लगवाओ कि “पाच पाई नहीं तो काम नहीं” !!!! मज़दूरन ने भी हमसे कही कि मान लो हमाइ बात न मानी गई तो ???? तब मैंने कही कि थोड़े दिना कर्रे तो हो लो .... बस फिर का हतो शाम मे पेट्रोमैक्स जलाए , कंधे मे धरे और गाव के चक्कर के साथ मज़दूरन ने नारा लगावों शुरू कर द्ये “हमाओ नेता कैसा हो, शिवराज जैसा हो ” और “पाँच पाई नहीं तो काम नहीं” !!!! अब गाव के चक्कर लगाई रहे थे कि अपने घर के सामने जा पहुचे, हम भी आगे आगे और मजदूर पीछे पीछे , इतने मे हमाए घर के दरवाजा खुले और चाचा बड़ी सी सटइया लेकर बाहर, मोहे समझ मे आ गई कि शिवराज अब तेरी खेर नहीं, और इतने मे पीछे खड़े मजदूर जो कछु देर पहले नारा लागा रहे थे – वे सब नदारद , चाचा अंदर ले गए, पिटाई जो भई सो भई , सज़ा के तौर पे घर पे कटी रखी फसल को दामन करवाया सो अलग, खैर इस घटना का परिणाम ये रहा कि कुछ दिन बाद मजदूरो कि इस समस्या पर गाव वालो ने गौर किया और हमारा पहला आंदोलन सफल रहा l
             13 वर्ष के जिस शिवराज ने अपने नेत्रत्व मे गाव के मजदूरो को संघठित कर सफल आंदोलन किया अब वही शिवराज सफल प्रसाशनिक नेत्रत्व कर किसानो मजदूरो के लिए योजनाए बनाकर उनका सफल क्रियान्वयन कर रहे है, वर्तमान परिवेश मे देखने लायक एक बात और भी है कि  आज प्रदेश मे एक बड़ा इलाका सूखा ग्रषित है, अगर शिवराज सरकार ने पिछले 10 वर्षो के दौरान सिचाई का रकबा साढ़े सात लाख हेक्टेयर से बढ़ाकर 27 लाख हेक्टेयर तक नहीं पहुचया होता तो हालत और भी भयावह होते, नर्मदा क्षिप्रा के साथ अब पार्वती , और काली सिंध को भी नर्मदा से जोड़ने कि दिशा मे तेजी से प्रयास किए जा रहे है, वही बुंदेलखंड के पन्ना छतरपुर और टीकमगढ़ जिलो मे सिचाई हेतु केन बेतवा लिंक परियोजना को कैसे धरातल पर लाया जाए इसके लिए शिवराज के प्रयास जारी है, आज जब किसान ओला पाला, सूखा और अति व्रष्टि से व्यथित है ऐसे मे शिवराज अपने ह्रदय कि समवेदनाओं के साथ प्रदेश के किसानो का मनोबल ऊंचा करने के लिए बार बार यही कह रहे है कि “साल हारे है,ज़िंदगी नहीं हारने दूँगा” और इस वाक्य को चरितार्थ करने हेतु किसानो की  कर्ज माफी, अस्थायी बिजली कनैक्शन,फसल बीमा की राशि का त्वरित वितरण, फसलों पर निर्भरता कम हो इसके लिए आय के अन्य साधनो एवं श्रोतों पर काम करने के लिए आदेश एवं विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर किसानो के कल्याण हेतु अनुपूरक बजट पास करा रहे है
              शिवराज के संवेदनशीलता और कार्यशैली की बानगी क्रषी विकास तक ही सीमित नहीं रही उन्होने अपने प्रसाशनिक नेत्रत्व के बल पर देश के दिल को पर्यटन की द्रष्टि से भी विकसित करने के लिए अभूतपूर्व काम किए है, आज पूर्व की तुलना मे मध्यप्रदेश आने वाले पर्यटको की संख्या बढ़ी है जिसके फलस्वरूप हमारे पर्यटन क्षेत्रो मे रहने वाले युवको को रोजगार भी मिला है, विश्व धरोहर सांची, भीमबैठका और खजुराहो के विकास के साथ छोटे छोटे पर्यटन स्थल जैसे मांडू, चँदेरी, चित्रकूट, पन्ना, महेश्वर और ओंकारेश्वर इत्यादि को प्रदेश के पर्यटन नक्शे मे लाकर इस और ध्यान दिया जा रहा है, टाइगर स्टेट कहे जाने वाले इस प्रदेश मे शिवराज सरकार तानसेन समारोह, महेश्वर महोत्सव, कालीदास समारोह, कुमार गंधर्व समारोह , भोपाल का लोकरंग समारोह, लोकरंगन खजुराहो, अलाउद्दीन खाँ समारोह मैहर, भगोरिया उत्सव झाबुआ और अंतराष्ट्रीय न्रत्य समारोह खजुराहो को मनाकर प्रदेश की ऐतिहासिक, सांस्क्रतिक धरोहरों को विश्व पटल तक पेहुचाने का अद्वितीय कार्य कर रही है। 2016 मे होने वाले सिंहस्थ को लेकर सरकार की सक्रियता देखने योग्य है, सिंहस्थ महाकुंभ के पूर्व शिवराज सरकार ने विचारो के महाकुंभ के तीन बड़े अंतर्राष्ट्रीय आयोजन मूल्य आधारित जीवन भोपाल मे, धर्म-धम्म सम्मेलन इंदौर और ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन पर अंतराष्ट्रीय सम्मेलन भोपाल मे आयोजित कर यह बता दिया है कि हिंदुस्तान का दिल जल्द ही वैश्विक स्तर के एक बड़े आयोजन सिंहस्थ का सफल आयोजक एवं साक्ष्य बनेगा l
               29 नवंबर 2005 को सत्ता सीन हुए शिवराज ने आज 29 नवंबर 2015 तक अपनी राजनीति मे भी ज़्यादातर समय ऊंचाइया ही प्राप्त की, विरोधियों को शालीनता और मर्यादित भाषा के साथ जबाब देने और सदन मे विपक्षी दलो को बोलने , उन्हे सुनने एवं महत्व देने की राजनीति शिवराज को आज के दौर के नेताओं से कहीं आगे की पंक्ति मे खड़ा कर देती है, सदन के बाहर भी उनके विपक्ष के कांग्रेसी साथी उनकी इस अदा के कायल रहते है और अनौपचारिक चर्चाओ मे अक्सर यही जिक्र करते रहते है कि शिवराज के मुख्यमंत्री रहते कांग्रेस को सत्ता पाना एक टेढ़ी खीर साबित होगा l अभी हाल ही मे झाबुआ चुनाव मे कांग्रेस् के विजय होने पर भी कांग्रेस् के नेता 2018 मे विधानसभा चुनाव मे जीत के लिए इतने आश्वस्त दिखाई नहीं दे रहे जितने की शिवराज सिंह चौहान !!!!               
                                                                            -सत्येंद्र खरे

                                                                                    

Saturday, 28 November 2015

(मुख्यमंत्री शिवराज के 10 साल –भाग 1) शिवराज सिंह चौहान :- व्यक्तित्व, राजनीति और प्रसाशनिक नेत्रत्व

(मुख्यमंत्री शिवराज के 10 साल –भाग 1)
शिवराज सिंह चौहान :- व्यक्तित्व, राजनीति और प्रसाशनिक नेत्रत्व
          
            इस 29 नवंबर को शिवराज सिंह चौहान बतौर मुख्यमंत्री अपने 10 साल पूरे कर लेंगे, इन 10 सालो मे शिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेश को क्या कुछ दिया और अपनी राजनीति को तमाम विरोधो विवादो के बीच कैसे बचाए रखा ये एक लंबी चर्चा का विषय हो सकता है, परंतु आज से 10 साल पहले प्रदेश की राजनीति, और भाजपा मे चल रही उथल पुथल के बीच शिवराज का प्रदेश की राजनीति मे इतने बड़े स्तर पर पदार्पण करना भी किसी अचंभे से कम नहीं था, बहरहाल उस समय हुए इस अप्रत्याशित परिवर्तन से प्रदेश को आज तक कभी किसी बड़े नुकसान का सामना नहीं करना पड़ा बल्कि शिवराज के मुख्यमंत्री बनने के बाद पिछले एक दशक मे प्रदेश के इतिहास मे एक बड़ी सामाजिक क्रांति ही देखी गई और 10 साल मे मुख्यमंत्री रहते शिवराज के अथक प्रयासो से प्रदेश के ग्रामीण इलाको मे हुए सामाजिक परिवर्तन के लिए की गई तमाम घोषणाओ, योजनाओं एवं उनके सफल क्रियान्वयन के दम पर भाजपा और शिवराज लगातार तीसरी बार प्रदेश की सत्ता पाने मे सफल हुए
           शिवराज जब राजनीति मे आए उस दौरान देश मे इन्दिरा और कांग्रेस के विरुद्ध एक बड़ी लहर देखी जा रही थी, 1975 मे देश मे लगे आपातकाल के दौरान जेल जाने वाले शिवराज कदाचित सबसे कम उम्र के स्वयं सेवक रहे होंगे, 77-78 मे जब देश मे जनता पार्टी कि सरकार बनी तब शिवराज ने संघ कि सेवा करने का ही मन बनाया और धीरे धीरे राजनीति मे अपनी परिपक्वता साबित करने लगे, 1977 से लेकर 1983 तक शिवराज सिंह चौहान ने छात्र राजनीति के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद मे विभिन्न पदो को अपने नेत्रत्व क्षमता से सुशोभित किया और बाद मे भारतीय जनता युवा मोर्चा मे प्रदेश के सयुंक सचिव बन कर अपनी राजनेतिक यात्रा को नई दिशा दी, 1988 मे जब शिवराज पहली बार युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष बने तब तत्कालीन कांग्रेस् सरकार के शासन और जुल्मो के विरोध मे एक मशाल जुलूस का आयोजन किया और उन्होने राजमाता सिंधिया से आग्रह कर इस जुलूस के नेत्रत्व करने की बात कही, तब प्रदेश मे भाजपा के तत्कालीन नेत्रत्व के सामने दो बड़ी चुनोतिया सामने आ गई कि क्या राजमाता सिंधिया, नाना जी देशमुख और कुशा भाऊ ठाकरे के कद और गरिमा केहिसाब से समर्थन जुट पाएगा ? ऐसे मे शिवराज ने ग्रामीण क्षेत्रो से 40000 किसानो के आने कि बात कहकर पूरे पार्टी नेत्रत्व को सहमा दिया , परंतु जब 7 अक्टूबर 1988 को भोपाल मे जुलूस निकला तब भोपाल आने वाली सारी सड़के ट्रैक्टर, ट्रक, जीप और बैलगाड़ियों से अटी पड़ी थी , संख्या 40000 से कही ज्यादा थी और दो दिन तक मशाल जुलुस मे आए ग्रामीणो का भोपाल से लौटना बदस्तूर जारी रहा , 7 अक्टूबर के दिन ही राजमाता सिंधिया ने शिवराज के सिर पर हाथ रख आशीर्वाद दिया और ऐलान किया कि यह लड़का राजनीति मे बेहूत आगे जाकर देश को नई दिशा प्रदान करेगा 
            शिवराज जब से राजनीति मे आए है उन्होने कभी अपनी ज़मीन छोड़ने की तनिक कोशिश भी नहीं की , वे हमेशा से अपने ठेठ अंदाज मे ही जनता के बीच जाते रहे और अपने भाषणो मे बुन्देली जुमलो का प्रयोग कर समाज के पिछड़े वर्गो के बीच लोकप्रियता हासिल करते रहे है, आज के आधुनिक युग मे जब सब कुछ हाइटेक हो रहा है ऐसे मे शिवराज ने अपने आप को कभी ऐसे प्रतीत नहीं होने दिया कि वो इस ह्रदय प्रदेश के मुखिया है, उनकी जनता के बीच शुरू मे बनी “पाव पाव वाले भैया” जैसी छवि आज भी बरकरार है जो कि उन्हे देश के अन्य मुख्यमंत्रियों से अलग करती है
          शिवराज आज ही नहीं बल्कि अपने राजनैतिक काल के प्रारम्भ से ही एक ऐसे  संवेदनशील व्यक्ति के रूप मे पहचाने जाने लगे थे जिसके मन मे गरीब, किसान, बुजुर्ग, महिलाओं और बच्चो कि बेहतरी करने के लिए हमेशा पीड़ा रही है , शिवराज सिंह चौहान जब 1991 मे बुधनी से विधायक और 1992 मे विदिशा से सांसद बने तब उन्होने हजारो कि संख्या मे सामूहिक विवाह कराये और कई कन्याओं का कन्यादान लेकर यह संदेश दिया कि कन्या धरती पर भोज नहीं है, और बाद मे जब वे मुख्यमंत्री बने तब उन्होने “कन्यादान योजना” बनाकर माताओं के भाई और बेटियों के मामा बनकर स्वयं कि छवि एक “मामा मुख्यमंत्री” के रूप मे स्थापित कर ली जो आज तक बदस्तूर जारी है, बतौर मुख्यमंत्री रहते उनके काल मे भ्रूण हत्या को रोकने के लिए जो काम शिवराज कि महत्वाकांछी “लाड़ली लक्ष्मी योजना” और “बेटी बचाओ अभियान ”ने किए वो अब तक देश का कोई बड़ा कानून भी संभव नहीं कर पाया है, आज प्रदेश मे 2001 कि मे प्रति हज़ार 919 महिलाओं कि संख्या बढ़कर 2011 मे 931 महिला प्रति हज़ार हो गई है
           गावों मे सामाजिक क्रांति लाने के लिए शिवराज सिंह चौहान के कुछ प्रयास और प्रसाशनिक नेत्रत्व अत्यंत सरहनीय रहे जो अनेक राज्यो एवं केंद्र के लिए अनुकरणीय बने,, गाव कि बेटी योजना, जननी सुरक्षा एव जननी प्रसव योजना, स्वागतम लक्ष्मी योजना, उषा किरण योजना, तेजस्विनी,वन स्टॉप क्राइसेस सेंटर , लाडो अभियान, महिला सशक्तिकरण योजना,  कन्यादान एवं निकाह योजना, शोर्य दल का गठन, छात्राओं के लिए मुफ्त पाठ्य पुस्तके, साइकिल, विभिन्न छात्रव्रतियाँ और नगरीय निकाय मे 50 प्रतिशत महिला आरक्षण कर महिला सशक्तिकरण कि दिशा मे देश भर मे सर्वाधिक कार्य होने के अद्वितीय उदाहरण बने, महिलाओं कि बेहतरी कि दिशा मे उठाए गए इन कदमो का श्रेय शिवराज को ही जाता है और इसी का परिणाम यह रहा कि 2013 मे हुए विधानसभा चुनाव मे महिलाओं ने शिवराज सिंह चौहान को जिताने मे कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी
            आज शिवराज प्रदेश के ऐसे मुख्यमंत्री के रूप मे पहचान बना चुके है जो प्रदेश के मुखिया भले हो परंतु ज़मीन पर जाकर काम करने से कभी परहेज नहीं करते ,एक सेवक के रूप मे वे गावों मे , खेतो मे , पंचायतों मे जाकर ये परखने का काम आज भी कर रहे है और अपनी ज़मीन की परख के बल पर ऐसी योजनाए बनाने मे सक्षम हुए है जिससे गावों का विकास तो संभव हो ही साथ ही उनकी राजनीति भी गाव, जंगल, जमीन , किसान और महिला कल्याण के रूप मे जानी जाती रहे l  
-    सत्येंद्र खरे


Monday, 9 November 2015

बिहार चुनाव परिणाम का मध्यप्रदेश की राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?

बिहार चुनाव परिणाम का मध्यप्रदेश की राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?
2014 में लोकसभा चुनाव के बाद राजनैतिक हल्कों में यही माना जाता रहा कि बिहार ही पहला राज्य बनेगा जहाँ के चुनाव परिणाम यह तय करेंगे कि देश की राजनीति की नई दिशा क्या होगी ? और भाजपा के मोदी, शाह की जुगल जोड़ी का भविष्य क्या होगा ? दिल्ली और अब बिहार चुनाव परिणामो ने यह बता दिया है कि भाजपा संघठन को अपनी रणनीति पर विचार करने की जरुरत है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले 1.5 वर्षो में देश के विकास में जो उपब्धियाँ हासिल की वो काबिले तारीफ है परन्तु देश के आंतरिक मामलो में जो एक अविश्वास बढ़ा है उस पर भी अब ज्यादा ध्यान देने की जरुरत बढ़ गई है क्यूंकि मीडिया में लगातार अ रही असहिष्णुता की खबरों पर प्रधानमंत्री मोदी को बोलने की जरुरत भी आन पड़ी है तो वही संघठन को भी चाहिए कि ऐसे नेताओ पर नकेल कसे जो गाहे बगाहे जबरन की फिजूल बयानबाजी कर सुर्खियाँ बटोर रहे है,और भाजपा की नीव कमजोर करने का काम करने का काम कर रहे है , प्रधानमंत्री के ही शब्दों में बात करे तो “सबका साथ-सबका विकास” में हमे सबके साथ की ही जरुरत पड़ेगी, किसी एक को साथ लेकर चलने की बात पर देश में अब विकास संभव नही है
यहाँ बात मध्यप्रदेश के सन्दर्भ में हो रही है तो यह भी जान लेना जरुरी है कि प्रदेश में भी पिछले लगभग 12 वर्षो से भाजपा की सरकार है और 10 वर्षो से मुख्यमंत्री शिवराज, सरकार का सफलतम क्रियान्वयन कर रहे है , यहाँ यह भी कहना गलत नही होगा की अटल बिहारी बाजपेइ के बाद शिवराज ही भाजपा के एक मात्र ऐसे नेता है जिन पर मुस्लिमो का विस्वाश हमेशा कायम रहा है, शिवराज ने अपनी संवेदनशीलता के चलते हर वर्ग का विश्वाश कायम कर विकास की द्रष्टि से सफल कदम उठाये है, हालाँकि केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद जिस प्रकार अमित शाह और मोदी ने मिलकर भाजपा संघठन के वरिष्ठ नेताओं को एक एक कर किनारे लगाना शुरू किया तो उसी दिन से यह भी माना जाने लगा कि शिवराज, वसुंधरा और रमन सिंह के भी दिन जल्दी पूरे होंगे, मीडिया भी समय समय पर यह खबरे दे रहा था की बिहार चुनाव में मोदी शाह सफलता हासिल करते है तो इन तीनो को केंद्र में बुलाकर अपने गुट के नेताओं को यहाँ आसीन कराएँगे, यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि मोदी जब मुख्यमंत्री थे तो शिवराज भाजपा में ऐसे दुसरे नेता रहे जिन्हें हमेशा से राज्य की जनता से प्यार और आशीर्वाद मिलता रहा, शिवराज की जनकल्याणकारी नीतियों की वजह से ही भाजपा की पहुच मध्यप्रदेश में गाँव तक बढ़ी, वहीँ भाजपा संघठन के केंद्र में तत्कालीन नेता रहे आडवानी ने भी खुले तौर पर यह कहना शुरू कर दिया था कि एन डी ए में मोदी के नाम पर सहमति नहीं बनती है तो शिवराज प्रधानमंत्री पद के लिए दुसरे विकल्प होंगे, मोदी के नाम पर ही नितीश ने असहमति जताकर एन डी ए से जे डी यू को अलग किया था
आज जब बिहार के चुनाव में नितीश और लालू की सरकार बनना तय हो गया है तो इसके उलट मध्यप्रदेश के राजनैतिक हल्कों , और मीडिया में कुछ दिन पहले ये खबरे चल रही थी कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व जल्द ही शिवराज को केंद्रीय मंत्रिमंडल में कृषि मंत्रालय की जिम्मेदारी सौपेगा लेकिन बिहार के जैसे नतीजे आये है तो अभी इन खबरों पर विराम स्वतः ही लग जायेगा, हालाँकि जब से मोदी सरकार केंद्र में सत्तासीन हुई है तब से मध्यप्रदेश को न तो कोई विशेष लाभ हुआ है और न ही राज्य को केंद्र से मिलने वाली आर्थिक मदद पूरी तरह से नसीब हुई है, आज जब प्रदेश में सूखे के भयावह हालात बने हुए है ऐसे में शिवराज और शिवराज के मंत्री मोदी सरकार के सामने लगातार आर्थिक मदद के लिए नार्थ ब्लाक के चक्कर पे चक्कर काट रहे है तो वही नरेन्द्र मोदी मध्यप्रदेश के किसानो की सुध लेने की बजाय बिहार में 1 लाख 65 हज़ार करोड़ , तो जम्मू कश्मीर में 80 हज़ार करोड़ देने की बात कर रहे है परन्तु मध्यप्रदेश को देने के लिए 2500 करोड़ रूपए भी नही है जो की प्रदेश के कई समय से लंबित पड़े हुए है, ऐसे में आज नही तो कल हालात भाजपा विरोधी बन जायेंगे, शिवराज तो फिर भी इन हालात से भाजपा को निकालने के लिए पुरजोर कोशिश कर रह है , किसान को राहत देने के लिए विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर अनुपूरक बजट को स्वीकृत किया जा रहा है तो प्रदेश में निवेश के लिए कहीं अरब तो कहीं जापान कोरिया के दौरे कर रहे है , माहौल जो भी हो मोदी को भी चाहिए कि जिस विकास की वो बात कर रहे है वो राज्यों से ही होकर जाता है , आज राज्य सभा में भाजपा का बहुमत नही है और ऐसे में मोदी सरकार को भी चाहिए कि विदेश नीति से इतर राज्यों की सुध लेना शुरू करे और चुनाव में सफल होकर राज्यसभा से उन बिलों को पारित करा सके जिससे मोदी के विकसित भारत के सपने को साकार किया जा सके , साथ ही भाजपा केंद्रीय संघठन और नागपुर में संघ भी अब इस बात पर गौर करें कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकार है वहां विकास की परियोजनाओं पर विशेष ध्यान दिया जाये जिससे इन राज्यों के कार्यकर्ताओं और जनता में भाजपा के प्रति विस्वास बना रहे
बहरहाल आज के परिणामो से हम इस निष्कर्ष पर तो पहुच ही सकते है कि भाजपा संघठन शीघ्र ही एक चिंतन बैठक कर पार्टी की नीतियों पर विचार करेगा और मोदी शाह की जुगल जोड़ी से आगे निकलकर अन्य संभावनाओं पर भी गौर करेगा जिससे आने वाले समय में भाजपा शाषित राज्यों में विकास की उन संभावनाओं की परिकल्पनाओं को साकार किया जा सकेगा जिन्हें मोदी ने अपने 2014 के लोकसभा के चुनावो के भाषणों में समाहित कर चुनाव में जीत हासिल की थी, अब रही बात मध्यप्रदेश की तो बिहार चुनाव के परिणाम आने के बाद शिवराज की कुर्सी को हाल फ़िलहाल अब कोई खतरा दिखाई नही दे रहा लेकिन शिवराज को भी चाहिए कि अब खेती को लाभ का धंधा बनाने के साथ राज्य में औद्योगिक द्रष्टि से विकास संभव हो सके इसके लिए प्रयासों में तेज़ी लानी होगी और यहाँ के युवाओं को रोजगार नसीब हो जिससे आने वाले 2018 के विधानसभा चुनाव में जनता जनार्दन एक बार फिर से भाजपा और शिवराज के प्रति अपना प्यार और आशीर्वाद जता सके

Sunday, 8 November 2015

बिहार चुनाव परिणाम का मध्यप्रदेश की राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?

बिहार चुनाव परिणाम का मध्यप्रदेश पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?

          2014 में लोकसभा चुनाव के बाद राजनेतिक हलको में यही माना जाता रहा  की बिहार ही पहला राज्य बनेगा  जहाँ के चुनाव परिणाम यह तय करेंगे की देश की राजनीती की नई दिशा क्या होगी ? और भाजपा के मोदी, शाह की जुगल जोड़ी का भविष्य क्या होगा, दिल्ली और अब बिहार चुनाव परिणामो ने यह बता दिया है कि भाजपा संघठन को अपनी रणनीति पर विचार करने की जरुरत है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले 1.5 वर्षो में देश के विकास में जो उपब्धियाँ हासिल की वो काबिले तारीफ है परन्तु देश के आंतरिक मामलो में जो एक अविश्वास बढ़ा है उस पर भी अब ज्यादा ध्यान देने की जरुरत बढ़ गई है क्यूंकि  मीडिया में लगातार अ रही असहिष्णुता की खबरों पर प्रधानमंत्री मोदी को बोलने की जरुरत आन पड़ी है तो वही संघठन को भी चाहिए कि ऐसे नेताओ पर नकेल कसे जो गाहे बगाहे जबरन की फिजूल बयानबाजी कर सुर्खियाँ बटोर रहे है,और भाजपा की नीव कमजोर करने का काम करने का काम कर रहे है , प्रधानमंत्री के ही शब्दों में बात करे तो सबका साथ-सबका विकास में हमे सबके साथ की ही जरुरत पड़ेगी, किसी एक को साथ लेकर चलने की बात पर देश में अब विकास संभव नही है
          यहाँ बात मध्यप्रदेश के सन्दर्भ में हो रही है तो यह भी जान लेना जरुरी है कि प्रदेश में भी पिछले लगभग 12 वर्षो से भाजपा की सरकार है और 10 वर्षो से मुख्यमंत्री शिवराज सरकार का सफलतम क्रियान्वयन कर रहे है , यह भी कहना गलत नही होगा की अटल बिहारी बाजपाई के बाद शिवराज ही भाजपा के एक मात्र ऐसे नेता है जिन पर मुस्लिमो का विस्वास हमेशा कायम रहा है, शिवराज ने अपनी संवेदनशीलता के चलते हर वर्ग का विश्वास कायम कर विकास की द्रष्टि से सफल कदम उठाये है, हालाँकि केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद जिस प्रकार अमित शाह और मोदी ने मिलकर भाजपा संघठन के वरिष्ठ नेताओं को एक एक कर किनारे लगाना शुरू किया उसी दिन से यह भी माना जाने लगा कि शिवराज, वसुंधरा और रमन सिंह के भी दिन जल्दी पूरे होंगे, मीडिया भी समय समय पर यह खबरे दे रहा था की बिहार चुनाव में मोदी शाह सफलता हासिल करते है तो इन तीनो को केंद्र में बुलाकर अपने गुट के नेताओं को यहाँ आसीन कराएँगे, यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि मोदी जब मुख्यमंत्री थे तो शिवराज भाजपा में ऐसे दुसरे नेता रहे जिन्हें हमेशा से राज्य की जनता से प्यार और आशीर्वाद मिलता रहा,  शिवराज की जनकल्याणकारी नीतियों की वजह से ही भाजपा की पहुच यहाँ गाँव तक बढ़ी, वहीँ भाजपा संघठन के केंद्र में तत्कालीन नेता रहे आडवानी ने भी खुले तौर पर यह कहना शुरू कर दिया था कि एन डी ए में मोदी के नाम पर सहमति नहीं बनती है तो शिवराज प्रधानमंत्री पद के लिए दुसरे विकल्प होंगे, मोदी के नाम पर ही नितीश ने असहमति जताकर एन डी ए से जे डी यू को अलग किया था
          आज जब बिहार के चुनाव में नितीश और लालू की सरकार बनना तय हो गया है तो इसके उलट मध्यप्रदेश के राजनैतिक हल्कों , और मीडिया में कुछ दिन पहले ये खबरे चल रही थी कि भाजपा का केंद्रीय  नेतृत्व जल्द ही शिवराज को केंद्रीय मंत्रिमंडल में कृषि मंत्रालय की जिम्मेदारी सौपेगा लेकिन बिहार के जैसे नतीजे आये है तो अभी इन खबरों पर विराम स्वतः ही लग जायेगा, हालाँकि जब से मोदी सरकार केंद्र में सत्तासीन हुई है तब से मध्यप्रदेश को न तो कोई विशेष लाभ हुआ है और न ही राज्य को केंद्र से मिलने वाली आर्थिक मदद पूरी तरह से नसीब हुई है, आज जब प्रदेश में सूखे के भयावह हालात बने हुए है ऐसे में शिवराज और शिवराज के मंत्री मोदी सरकार के सामने लगातार आर्थिक मदद के लिए नार्थ ब्लाक के चक्कर पे चक्कर काट रहे है तो वही नरेन्द्र मोदी मध्यप्रदेश के किसानो की सुध लेने की बजाय बिहार में 1 लाख 65 हज़ार करोड़ , तो जम्मू कश्मीर में 80 हज़ार करोड़ देने की बात कर रहे है परन्तु मध्यप्रदेश को देने के लिए 2500 करोड़ रूपए भी नही है जो की प्रदेश के कई समय से लंबित पड़े हुए है, ऐसे में आज नही तो कल हालात भाजपा विरोधी बन जायेंगे, शिवराज तो फिर भी इन हालात से भाजपा को निकलने के लिए लगे हुए है, किसान को राहत देने के लिए विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर अनुपूरक बजट को स्वीकृत किया जा रहा है तो प्रदेश में निवेश के लिए कहीं अरब तो कहीं जापान कोरिया के दौरे कर रहे है , माहौल जो भी हो मोदी को भी चाहिए कि जिस विकास की वो बात कर रहे है वो राज्यों से हकर ही जाता है , आज राज्य सभा में भाजपा का बहुमत नही है और ऐसे में मोदी सरकार को भी चाहिए कि विदेश नीति से इतर राज्यों की सुध लेना शुरू करे तो चुनाव में सफल होकर राज्यसभा से उन बिलों को पारित करा सके जो मोदी के विकसित भारत के सपने को साकार कर सके, और साथ में भाजपा केंद्रीय संघठन और नागपुर में संघ भी अब इस बात पर गौर करेंगे कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकार है वहां विकास की परियोजनाओं पर विशेष ध्यान दिया जाये जिससे इन राज्यों के कार्यकर्ताओं और जनता में भाजपा के प्रति विस्वास बना रहे
      बहरहाल आज के परिणामो से हम इस निष्कर्ष पर तो पहुच ही सकते है कि भाजपा संघठन शीघ्र ही एक चिंतन बैठक कर पार्टी की नीतियों पर विचार करेगा और मोदी शाह की जुगल जोड़ी से आगे निकलकर अन्य संभावनाओं पर भी गौर करेगा जिससे आने वाले समय में भाजपा साशित राज्यों में विकास की उन संभावनाओं की परिकल्पनाओं को साकार किया जा सकेगा जिन्हें मोदी ने अपने 2014  के लोकसभा के चुनावो के भाषणों में समाहित कर चुनाव में जीत हासिल की थी, अब रही बात मध्यप्रदेश की तो बिहार चुनाव के परिणाम आने के बाद शिवराज की कुर्सी को हाल फ़िलहाल अब कोई खतरा दिखाई नही दे रहा  लेकिन शिवराज को भी चाहिए कि अब खेती को लाभ का धंधा बनाने के साथ राज्य में औद्योगिक द्रष्टि से विकास संभव हो सके और यहाँ के युवाओं को रोजगार नसीब हो जिससे आने वाले 2018 के विधानसभा चुनाव में तभी जनता जनार्दन का भाजपा के प्रति प्यार और आशीर्वाद संभव हो सकेगा
-         सत्येन्द्र खरे (स्वतंत्र पत्रकार )

                   
        




Monday, 27 July 2015

कलाम, तू माँ का सच्चा सपूत.. अग्नि नाग और त्रिशूल , ये सब तेरे ही रूप ।

भारत के मिसाइल मैन और 11वे राष्ट्रपति डॉक्टर अब्दुल पक्कीर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम साब अब हमारे बीच नही है.. उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि...
जब वे 25 जुलाई 2002 को देश के राष्ट्रपति बने उस दौरान मेरे द्वारा लिखी गई एक कविता आज आपके साथ साझा कर रहा हु...
समंदर का वो किनारा..
सुबह शाम अब तुम्हे पुकारे ।
तीर्थ यात्री अब रामेश्वरम में ,
तुम्हे देखने जाते ...
तू माँ का सच्चा सपूत..
देता ज्ञान के दीप हमे ।
जगाता अंतरज्ञान हममे...
शिक्षा का तू एक अनोखा रूप ।
जहाँ बाटे थे तूने अखबार..
उन पृष्ठों पर तू छाया आज ।
विकास का सागर तुममे ,
तू भारत माँ का सच्चा सपूत ।
नहीं जाने दी वो कुर्बानी बर्बाद,
शहीदों की थी जो भारत माँ के नाम ।
मेहनत मशक्कत दिक्कते कठिनाई ...
सब तुममे और तूने कर दिखाई,
माँ के सपने को सच और देश की बढ़ाई ।
तू माँ का सच्चा सपूत..
अग्नि नाग और त्रिशूल ,
ये सब तेरे ही रूप ।
बच्चों में भरता तू ज्ञान की गंगा..
बड़ो को भी न जाने देता तू इनसे अछूता ।
तू इस देश की अनोखी शान..
कलाम, भारत माँ कर रही तुझे सलाम।
त्रिची से दिल्ली तक तेरा सफ़र..
पल पल अनोखा और अजर ।
परम्परा से हटकर करता तू काम...
जो देता देश की प्रगति की एक नई मिशाल ।
तू भारत माँ का सच्चा सपूत ..
कलाम, भारत माँ कर रही तुझे सलाम ।

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आपका 
सत्येन्द्र खरे 
9993888677

Tuesday, 30 December 2014

मां की गोद, पिता का आश्रय मेरा मध्यप्रदेश है - 1 nov 2014


मध्यप्रदेष का स्थापना दिवस.......

मां की गोद, पिता का आश्रय मेरा मध्यप्रदेष है


मां की गोद पिता का आश्रय कहने का आषय यह है कि किसी बालक के विकास में एक मां जिस तरह बच्चे को अच्छे संस्कार देकर उसे भविष्य के लिए तैयार करती है उसी प्रकार एक पिता अपने बालक की नादानियों-गलतियों को सुधारकर उसे एक अच्छा नागरिक बनानें के लिए हमेषा तत्पर रहता है। वैसा ही आज के मध्यप्रदेष को बनानें में यहां की जनता और सरकारों ने अपने योगदान को बखूबी निभाया है। जिसके फलस्वरूप आज विकासषील मध्यप्रदेष हमारे समक्ष है। आज के विकासषील मध्यप्रदेष ने पं. रविषंकर शुक्ल से षिवराज सिंह चैहान तक एक लंबा कालखंड देखा है। स्वभाविक है कि इतने लंबे समय में कई बदलाव हुए होंगे। सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से राज्य ने विकास के कई आयामों का स्पर्ष भी किया होगा। लेकिन हृदय राज्य जनता जनार्दन के हृदय में कितनी जगह बना पाया है यह सवाल करना अभी जल्दबाजी होगा। प्रदेष के इतिहास में नजर डालें तो राज्य में ज्यादातर समय कांग्रेस की सरकारें रहीं हैं और साथ में इसी दौरान केन्द्र में कांग्रेस की केंद्र सरकार ने शासन किया है। केंद्र और राज्य में एक पार्टी की सरकार की दृष्टि से विकास को देखा व परखा जाये तो यह दुर्भाग्य ही रहा है कि मध्यप्रदेष कभी भी विकसित राज्यों की श्रेणी में नही आ सका। 1956 से ही प्रदेष के विकास को लेकर केन्द्र और राज्य सरकारों ने जो विकास की योजनाएं बनाई वे भलींभांति जमीन पर प्रदेष के 6 दषकों में सफल होने में पूरी तरह नाकामयाब रही। इसका दुश्परिणाम यह हुआ कि देष का तत्कालीन सबसे बड़ा राज्य नाममात्र के लिए बड़ा बनकर रह गया। 
सन् 2000 के पूर्व अविघटित मध्यप्रदेष में संसाधनों के अथाह भण्डार थे, तब कांग्रेस ने राज्य के विकास की चिंता नहीं की, अपितु मध्यप्रदेष विघटन के साथ कांग्रेस की दिग्गी सरकार जो विघटन के लिए पूरी तरह जिम्मेदार थी उसने राजनैतिक माहौल तैयार कर प्रदेष की जनता से झूठी बयानबाजी की थी कि कांगे्रस कम संसाधनों के साथ भी पूरी तरह विकास करनें में सक्षम है। मध्यप्रदेष विघटन के समय दिग्गी-जोगी के बीच हुई सत्ता स्थानांतरण की छिछालेदर को जनता ने 2003 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की विदाई के साथ समाप्त किया। 2000 में तीन नये राज्यों का गठन किया गया, उत्तरांचल, छत्तीसगढ़ और झारखण्ड। तीनों नये राज्यों में अपने मूल राज्य से ज्यादा विकास की क्षमताएं थी, लेकिन मूल राज्यों मध्यप्रदेष, उत्तरप्रदेष और बिहार के विकास की बात करें तो मध्यप्रदेष ने ही विकास को संभव बनाया है और इसका श्रेय 2003 में गठित हुई भारतीय जनता पार्टी की प्रदेष सरकार को दिया जाये तो यह अनुचित नहीं होगा। 
मध्यप्रदेष राज्य 2003 के मध्यप्रदेष की तुलना में काफी आगे आ चुका है। बिजली, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं के साथ प्रषासनिक अक्षमताओं से जूझ रहे प्रदेष को बाहर निकालने में षिवराज सरकार का महत्वपूर्ण योगदान है, 2003 से अब तक प्रदेष में भाजपा की सरकार है और केन्द्र में 2004 से मई 2014 तक यूपीए की सरकार रही है। ऐसी विषम परिस्थितियों में प्रदेष ने -4 प्रतिषत से लेकर 11.08 प्रतिषत आर्थिक विकास दर का सफर तय किया है, जो कि इस समय देष में सर्वाधिक है। ऐसा नहीं है कि मात्र आंकड़ों के आधार पर हम राज्य को विकसित राज्य घोषित कर दे। आज भी कई क्षेत्रों में विकास की आवष्यकताएं जस-की-तस बनी हुई है। रोजगार, उद्योग, जैसे कई क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें अब क्रांतिकारी बदलाव की जरूरत आन पड़ी है। खेती में भले प्रदेष 24.99 प्रतिषत की विकास दर हासिल कर नंबर 1 राज्य बन गया हो, परंतु कुपोषण जैसी समस्याओं से लड़ने के लिए षिवराज सरकार को भागीरथी प्रयास की जरूरत होगी। उद्योगों के परिप्रेक्ष्य में प्रदेष के पास कोई बड़ी उपलब्धि तो नहीं है, परन्तु प्रदेष सरकार निवेष के माध्यम से इस क्षेत्र में विकास करने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई दे रही है। इंदौर, ग्वालियर जैसे महानगरों में बंद पड़ी कपड़ा मिलों को दोबारा शुरू करने पर ध्यान देने की आवष्यकता है, जिससे इन क्षेत्रों में रोजगार की समस्या को दूर किया जा सके। आधुनिक समय में प्रदेष को आईटी हब बनाना षिवराज सरकार की एक नेक शुरूआत है। मेक इन एमपी जैसे कार्यक्रम प्रारंभ कर सरकार मेक इन इंडिया की सफलता में अपना योगदान एक जिम्मेदार एवं जबावदेह राज्य के रूप में दे सकती है। प्रदेष के औद्योगिक विकास की बात की जाये तो यहां एक बात बताना बेहद जरूरी है कि एषिया की एकमात्र हीरा खनन परियोजना प्रदेष के पन्ना जिले में है, और वह अपनी बदहाली के दिनों को बखूबी महसूस कर रही है। हीरा खनन परियोजना को दोबारा सुचारू रूप से प्रारंभ करने के लिए षिवराज सरकार को केंद्र के समक्ष अपनी तत्परता के साथ प्रभावकारी एवं परिणामकारी भूमिका को जल्द से जल्द से सुनिष्चित करना चाहिए। क्योंकि ऐसी परियोजनाएं बंद होने पर बेरोजगार व्यक्तियों का एक बड़ा वर्ग इस क्षेत्र में पैदा हो जायेगा। हीरे जैसी अमूल्य धरोहर रखने वाला यह क्षेत्र विकास के लिए आज भी तरस रहा है। हाल ही में संपन्न हुई इंदौर इन्वेस्टर्स समिट से सरकार ने राज्य में 6 लाख करोड़ रू. के निवेष का दावा पेष किया है। इस अच्छे प्रयास में हमें यह बात नहीं भूलना चाहिए कि जिन क्षेत्रों में विकास की दरकार अब भी है। जैसे बुंदेलखण्ड अंचल, आदिवासी अंचल इत्यादि। यहां सरकार उद्योग एवं कौषल विकास केंद्र खोलकर राज्य के इस क्षेत्र के पिछड़े जिलों डिंडौरी, अनूपपुर, मंडला, झाबुआ, अलीराजपुर, बैतूल, पन्ना, टीकमगढ़ के बेरोजगार युवकों की रोजगार की समस्या को हल करनें का काम जिम्मेदारीपूर्वक सुनिष्चित करे।
पर्यटन की दृष्टि से मध्यप्रदेष तेजी से उभरता हुआ प्रदेष साबित हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य ने अपने पर्यटन स्थलों को विष्व पटल पर पहुंचाया है। राज्य में ऐसे कई और क्षेत्र भी है जहां कि पारंपरिक जीवन शैली, ऐतिहासिक धरोहरें, मेले, उत्सव है, जिन्हें हम आगे लायें तो इस क्षेत्र में भी हम सफलता के नये आयाम स्थापित कर सकेंगे। बुंदेलखंड जैसे पिछड़े इलाकों को भी पर्यटन के माध्यम से विकसित किया जा सकता है। पन्ना और टीकमगढ़ जिले राज्य के पर्यटन विकास में सहायक बन सकते है। जैन तीर्थदर्षन की दृष्टि से टीकमगढ़ और पन्ना टाईगर रिजर्व के साथ जिले के भव्य मंदिरों, प्राकृतिक संुदरता को देष के पर्यटन मानचित्र पर लाकर पन्ना जिले के विकास और राज्य पर्यटन विकास को भी गति दी जा सकेगी। इसके साथ ही छिंदवाड़ा, होषंगाबाद जैसे जिले भी प्राकृतिक एवं आदिवासी परंपराओं से पर्यटन विकास के लिए अपना एक अलग स्थान रखते है। गुजरात ने जिस तर्ज पर पर्यटन विकास किया है, वह भले ही गुजरात राज्य का कोई मेला, मंदिर, उत्सव, पारंपरिक आयोजन हों उसी तर्ज पर प्रदेष के समस्त छोटे से छोटे उत्सव, मेले, मंदिरों को पर्यटन विकास के माध्यम से आगे लाकर स्वर्णिम मध्यप्रदेष बनानें की परिकल्पना को साकार करनें में मदद मिल सकती है। 
प्रदेष की खेती-किसानी अपने स्वर्णिम युग को देख रही है, दो बार मिले कृषि-कर्मण पुरस्कार, देष में सर्वाधिक कृषि विकास दर ने प्रदेष के किसानों के हौंसले बुलंद कर दिये है। लगातार बढ़ रहे सिंचाई के रकबे को 26 लाख हेक्टेयर तक पहुंचा दिया गया है। नदी जोड़ो अभियान से सिंचाई हेतु नहरें बनाकर सरकार ने अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किये है। प्रदेष के किसानों को जीरों प्रतिषत ब्याज पर मिल रहे कर्ज के हौंसले एवं उत्साह ने मध्यप्रदेष को कृषि क्षेत्र में हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों से भी आगे पहुंचा दिया है। इतना ही नहीं अगर मूलभूत सुविधाओं जैसे-बिजली, सड़क और पानी पर षिवराज सरकार ने संवेदनषीलता के साथ विकास कार्य नहीं किये होते तो राज्य में भारतीय जनता पार्टी की तीसरी बार सरकार का गठन होना नामुमकिन था। प्रदेष के षिक्षा स्तर को सुधारने में षिवराज सरकार ने अब तक जो प्रयास जमीनी स्तर पर किये है उससे एक मजबूत षिक्षा प्रणाली का आधार सुनिष्चित हो गया है। इस दिषा में मुफ्त षिक्षा, साईकिल वितरण, गणवेष, मध्यान्ह भोजन, पाठय-पुस्तकें और षिक्षा ऋण गारंटी जैसी योजनाओं को देकर राज्य के छात्र-छात्राओं को आगे निकलनें में सहायता प्रदान की है। परन्तु उच्च षिक्षा हेतु हमें भोपाल, इंदौर, ग्वालियर व जबलपुर जैसे महानगरों से बाहर निकलकर छोटे-छोटे जिलों में बड़े बदलाव करनें की आवष्यकता है। राज्य के छात्रों को रोजगार आसानी से प्राप्त हो सके, इसके लिए अभियांत्रिकी महाविद्यालयों में सरकारी प्लेसमेंट की नीति पर ध्यान देने की जरूरत है। 
मध्यप्रदेष में विकास के जो बड़े बदलाव देखे जा रहे है उसमें स्वास्थ्य सेवाओं का भी बदलता स्वरूप एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। कुपोशण जैसी समस्याओं से निपटने के लिए प्रदेष सरकार भले ही जमीनी स्तर पर काम कर रही हो, लेकिन कहीं न कहीं सरदार वल्लभभाई निःषुल्क दवा वितरण योजना, दीनदयाल उपचार योजना, जननी सुरक्षा योजना, 108 सेवा जैसी योजनाओं ने प्रदेष की जनता को मिल रहे स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार किया है। दो दिन पूर्व प्रारंभ हुई राज्य स्वास्थ्य सेवा गारंटी योजना द्वारा प्रदेष भर में 17 स्वास्थ्य सेवाओं की गारंटी सरकार के द्वारा ली जा रही है। प्रदेष में प्रांरभ हो चुके अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एम्स) के साथ-साथ और भी कई बड़े चिकित्सा संस्थान प्रदेष के चिकित्सा विकास में अपना योगदान सुनिष्चित कर रहे है। ये संस्थान और प्रदेष सरकार की स्वास्थ्य संबंधी योजनाएं भलीं-भांति जमीनी स्तर पर सुचारू रूप से फलीभूत हो जायें तो प्रदेष स्वास्थ्य सेवाओं में भी अग्रणी राज्य बनने में सफल हो जायेगा। 
मध्यप्रदेष इस वर्ष अपना 59वां स्थापना दिवस मनाने जा रहा है। राज्य के उज्जैन, ग्वालियर, भोपाल, मांडू, पचमढ़ी, खजुराहो, चित्रकूट, सांची जैसे पर्यटन स्थलों को देखकर हमें अहसास होना चाहिए कि हम देष के एक पारंपरिक तौर पर विकसित राज्य के वासी है। बुंदेलखंड, बघेलखंड, मालवा-निमाड़, महाकौषल में फैली कई रियासतों के गौरवषाली इतिहास को पढ़कर यह समझना चाहिए कि यह हृदय प्रदेष कितने बलिदानों और त्याग के बल पर बना है, इसे बेहद संवेदनषीलता के साथ समझने की आवष्कता है। प्रदेष में फैले देष के सर्वाधिक जंगल क्षेत्र, पेंच, पन्ना, बांधवगढ़, कान्हा जैसे टाईगर रिजर्व ने हमें प्रदेष के जंगलों में विचरण करते वन्य प्राणियों के साथ रहनें का अवसर प्रदान किया है, हमनें जंगलों को सुरक्षित करनें के प्रयासों में सरकार के साथ सहभागी बनने की जरूरत है। देष के सर्वाधिक आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र भी प्रदेष के पास है, यहां रह रहे हमारे आदिवासी भाईयों-बहनों को विकास की मुख्यधारा में लाने में हम कितने सहायक हो सकते है यह एक सोचने का विषय है। सरकारें अपने प्रयास करती रहती है, राज्य और राष्ट्र के विकास में हमें भी अपनी जिम्मेदारियों को परिलक्षित करना चाहिए। स्वर्णिम मध्यप्रदेष की परिकल्पना को साकार करनें में सरकार के साथ हृदय प्रदेष के वासी शामिल हो जायें तो देष का सर्वाधिक विकसित राज्य बनने में मध्यप्रदेष को ज्यादा समय नहीं लगेगा।